Thursday, January 2, 2014

कुमार विश्वास से 3 सवाल

कुमार विश्वास जी,



मेरा नाम असना रिज़वी है। मेरठ से मेरे खिलाफ चुनाव लड़ने की चुनौती पर आपकी चुप्पी कायम है। शायद आप इतने ऊपर बैठे हैं कि मुझ जैसे आम इंसान तक आपकी आवाज नहीं पहुंच पा रही।
फिर भी, मुझे लगा कि आपको कुछ याद दिलाती हूं। कुछ सवाल पूछती हूं, शायद आप का म्यूट बटन हटे। 


12 मार्च 2011 का दिन था, जामिया मिलिया इस्लामिया में आपका कविता पाठ था। आपकी कविताओं का क्रेज था और मैं भी सुनने वालों की भीड़ का हिस्सा थी। मुंह में गंगा हो, हाथ में तिरंगा हो, आपकी वे लाइनें आज भी मुझे याद है। आपके उन बोल से जो जोश भरा था वह आज भी याद है। 


लेकिन अफसोस, तब मुझे पता नहीं था कि देशभक्ति को आप एक खास रंग के नजरिए से ही देखते हैं, मुझे पता नहीं था कि दरबार बदलने के साथ देशभक्ति के रंग भी बदल जाते हैं, मुझे नहीं पता था कि कोई कवि भी इंसान को इंसान से अलग करने के रंग से देख सकता है।
कुछ सवाल हैं आपसे 


सवाल नंबर 1 –
मौत मौत होती है, मुझे यह जानकर धक्का लगा कि आप इंसान की मौत में भी मजहब तलाशते हैं। फेसबुक पर जब आपने लिखा, “क्या इशरत जहां की मौत उत्तराखंड में मारे गए 50 हजार लोगों से ज्यादा बड़ी है”, तो मैं सन्न रह गई। ये कैसा कवि है जो मरने वालों को धर्म के नाम पर दीवार बना रहा है। कैसा मेरा कवि तिरंगा के रंगों को अलग-अलग करके देख सकता है। 


सवाल नंबर 2 –
मैंने आपको मेरठ से चुनाव लड़ने की चुनौती दी, आप चुप रहे, लेकिन आप के फैंस की फौज मुझपर टूट पड़ी। तुम ही क्यों नहीं लड़ लेती अमेठी से। न तो मैं किसी पार्टी की एजेंट हूं और न ही किसी की खाल बचाने के लिए आपको चैलेंज कर रही हूं। मैं मेरठ में पैदा हुई और मेरे पैदा होने से पहले से यह शहर दंगों की आग में जलता रहा। आज भी इसे सांप्रदायिक संवेदनशील माना जाता है। आज भी मेरठ के आसपास नफरत की आग दहक रही है। आप सेक्युलर होने का नकाब पहनकर चल रहे हैं तो आपको यह इलाका नजर नहीं आया। या आप खास से और खास आदमी होने का रास्ता भर ढूंढ रहे थे। मैं आपको चैलेंज करती हूं, मेरठ या मुजफ्फरनगर से चुनाव लड़िए, मैं आपका सामना करूंगी और जनता फैसला करेगी कि किसी ने मास्क पहना है या नहीं। है जवाब?

सवाल नंबर 3
मुजफ्फरनगर का दर्द क्यों नहीं होता – दिल्ली से महज 50 किलोमीटर दूर से ऐसे कैंप का सिलसिला शुरू हो जाता है जहां अपना सब कुछ गंवाकर आए दंगा पीड़ित ठिठुरकर जान दे रहे हैं। यूपी के अमेठी से सांसद बनने की तैयारी कर रहे कवि देव, क्यों किसी को उस दर्द का अहसास तक नहीं होता। क्यों न तो आपके कवि ह्रदय से एक भी बोल उन पीड़ितों के लिए निकला, न ही आपने वहां जाकर जान दे रहे गरीबों का हाल पूछने की जहमत उठाई। क्यों आप उन गरीबों के लिए नहीं उठ खड़े होते जो ठंठ से लबरेज टेंट से भी खदेड़े जा रहे हैं। 


बस ये तीन सवाल रख रही हूं, इस उम्मीद के साथ कि आप कुछ तो चुभेगा जिससे आपकी नींद टूटेगी।

ये सवाल कठिन लगते हैं तो मेरठ से मेरे खिलाफ चुनाव लड़ने की मेरी चुनौती का ही जवाब दे दीजिए, इनकार कर दीजिए साफ साफ। 

पर कुछ तो बोलिए। खास कवि जी, इस आम लड़की को निराश मत कीजिए।
 

शुभकामनाओं सहित, 
 
उत्तरापेक्षी

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